राजनांदगांव जिला (..) में वन संसाधन एवं पर्यावरण

 

डाॅ. निवेदिता . लाल

सहायक प्राध्यापक, भूगोल, शासकीय कमला देवी राठी महिला महाविद्यालय, राजनांदगाव (..)

ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू संससदपअमकपजं/हउंपसण्बवउ

 

शोध सारांश:

संसाधन प्रकृति द्वारा दिया गया निःषुल्क उपहार है। समस्त जीवधारियों का अस्तित्व उससे जुड़ा हुआ है। पर्यावरण के वे समस्त जैव और अजैव तत्व संसाधन कहे जाते हैं, जिनके उपयोग की क्षमता मानव मे विद्यमान है। इस तरह प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से मानव का वन संसाधन एवं पर्यावरण से घनिष्ठ संबंध है।

 

ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू जीवधारियों, पर्यावरण संरक्षण, लिंगानुपात, कृषि प्रधान, ग्राम वन समिति, उच्च तकनीक रोपण, उत्कृष्ट वनीकरण

 

 

 

प्रस्तावनाः-

वन, जलवायु विज्ञान की आधारषिला  है तथा पर्यावरण को संतुलित, सुंदर और मनमोहक बनाने में इसका विषेष योगदान है। वन एवं पर्यावरण संरक्षण आज के युग की माँग है। वन संसाधन वायु को प्रदूषण रहित करने तथा मिट्टी कटाव को रोकता है।

 

अध्ययन का उद्देष्य एवं परिकल्पनाः-

01. राजनांदगांव जिलें में वनसंसाधन एवं पर्यावरण के संबंधों का अध्ययन करना।

02. कुल भौगोलिक क्षेत्र में वन का प्रतिषत ज्ञात करना।

03. पर्यावरण संतुलन के अवयवों का अध्ययन करना।

04. वन संसाधन के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लाभ का आंकलन करना।

05. जिलें में हो रहे नगरीय विकास एवं अन्य आधारभूत संरचनात्मक निर्माण कार्य से वन संसाधन एवं पर्यावरण में असंतुलन को स्पष्ट करना।

 

आंकड़ो का स्त्रोत एवं विधितंत्रः-

प्रस्तुत शोध पत्र वर्णनात्मक एवं विष्लेषणात्मक है। इसमें द्वितीयक आंकड़ों का उपयोग किया गया है। द्वितीयक आंकड़ों का संकलन जिला सांख्यिकी कार्यालय तथा जिला वन कार्यालय से किया गया है। संकलित आंकड़ों का प्रतिषत मान ज्ञात कर छायांकन आरेख द्वारा प्रदर्षित किया गया है।

 

अध्ययन क्षेत्रः-

भारत देष के 26 वें राज्य छत्तीसगढ़ के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में राजनांदगांव जिला 20̊ 70̍उत्तर से 22̊29̍उत्तरी अक्षांष तथा 82̊ 23̍ पूर्व से 81̊ 29̍पूर्वी देशान्तर के मध्य 8022ण्55वर्ग कि.मी. क्षेत्र में विस्तृत है।2011 के अनुसार यहाँ की जनसंख्या 1537133 है। राजनांदगांव जिला का लिंगानुपात 1015 है। प्रशासनिक दृष्टिकोण से राजनांदगांव जिलें में 9 तहसील, 8 नगर, 1653 ग्राम है।

 

वनों का वितरणः-

राजनांदगांव जिलें में वनों का वितरण असमान है, जिसका मुख्य कारण धरातलीय बनावट, मृदा का स्वरूप, वर्षा आदि तत्व है। वनों का वितरण को राजनांदगांव जिलें में तहसीलवार दर्शाया गया है -      

 

 

सारिणी क्र. - 1

क्र. तहसील    कुल भौगोलिक क्षेत्रफल

(वर्ग कि.मी.)  वन क्षेत्रफल

(वर्ग कि.मी.)  कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में वन क्षेत्रफल का प्रतिषत

1.  छुईखदान  742.89  202.81  27.30

2.  खैरागढ़    805.32  242.74  30.14

3.  डोंगरगढ़   765.53  362.18  47.31

4.  राजनांदगांव       742.65  25.47   3.43

5.  छुरिया     800.19  167.26  20.90

6.  डोंगरगांव   412.49  103.54  25.10

7.  अं. चैकी   547.47  78.55   14.34

8.  मोहला     701.63  499.79  71.23

9.  मानपुर    896.19  518.92  57.90

कुल    6414.36 2201.26 34.31

आरक्षित वन       943.17

संरक्षित वन       665.02

     

 

 

1.  अधिक वन वाले क्षेत्र (40 से अधिक)

इसके अंतर्गत जिलें की वह तहसीलें सम्मिलित हैं, जहां कुल भौगोलिक क्षेत्र में वनों का प्रतिशत 40 से अधिक है। इसमें डोंगरगढ़ (47.31), मोहला (71.23) तथा मानपुर (57.90) तहसीलें आती हैं। जिलें के औसत से अधिक वन इन तहसीलों में पाये जाते हैं। इन वनों में सागौन, साजा, बीजा, महुआ, कर्रा, बांस लेण्डिया आदि वृक्षों की अधिकता है। इन वनों का आर्थिक महत्व अधिक है। पर्यावरण संतुलित है।

 

2.  मध्यमवन वाले क्षेत्र (20 .40)

इसके अंतर्गत जिलें की कुल 3 तहसीलें आती हैं, जिसमें वनों का वितरण कुल भौगोलिक क्षेत्र में वनों का प्रतिशत 20 से 40ःके मध्य मिलता है। छुईखदान (27.30), खैरागढ़ (30.14) तथा डोंगरगांव (25.10) तहसीलें सम्मिलित हैं। इन तहसीलों में जिले के औसत से कम वन मिलते हैं। कृषि प्रधान क्षेत्र तथा शहरीकरण के कारण इन तहसीलों में वनों का विस्तार कम है। वनों के संरक्षण एवं वृक्षारोपण की यहां आवश्यकता हैं, जिससे वनों का विस्तार हो सके तथा पर्यावरण संतुलित हो सके।

 

 

 

 

3.  कम वन वाले क्षेत्र (20 से कम)

जिलें की तहसीलें जहां वनों का वितरण कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में 20 से कम मिलता है। इसमें राजनांदगांव (3.43), छुरिया (20.90) तथा अंबागढ़ चैकी (14.34) सम्मिलित हैं। इसका मुख्य कारण राजनांदगांव में औद्योगिक विकास एवं नगरीकरण, अंबागढ़ चैकी तथा छुरिया में कृषि भूमि का विस्तार अधिक है। इन तहसीलों में वनों की सुरक्षा सामाजिक वानिकी कार्यक्रम के तहत एवं प्रकृतिवादी षिक्षा का प्रसार कर वन संसाधन संरक्षण की आवश्यकता है।

 

राजनांदगांव जिलें में वनों का वर्गीकरण (वर्ग कि.मी. में)-

 

सारिणी क्र. -2

क्र. वर्गीकरण  वनों का क्षेत्रफल

        1991    2010    2014

1.  आरक्षित   1444.87 943.17  773.39

2.  संरक्षित    1322.43 1709.15 1428.53

3.  वर्गीकृत    -       270.69  76.04

कुल    2770.3  2923.01 2277.96

 

 

 

आरक्षित वनों का प्रबंध सुव्यवस्थित ढंग से किया जाता है, जो आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भूमि कटाव, बाढ़ की रोकथाम, जलवायु, औषधि एवं लकड़ी आपूर्ति की दृष्टि से इन्हें संरक्षित वनों की श्रेणी में रखा गया है। इससे अनेक मूल्यवान वनोपज वस्तुएं प्राप्त की जाती है। इनमें लकड़ी काटना एवं पशुचारण निषेध है।

 

 

जिलें में 1991 में आरक्षित वन 1447.87 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला था, किंतु 2010 एवं 2014 के आकड़ों के अनुसार आरक्षित वन में संकुचन हुआ है। वन के संकुचन का प्रभाव जलवायु, भूमिकटाव एवं वनोपज की प्राप्ति पर भी पड़ता है। आरक्षित वन की क्षति हो तथा इसमें वृद्धि किये जाने हेतु प्रयास की आवश्यकता है।

 

राजनांदगांव जिला में संरक्षित वन का विस्तार 1991 में 1322.43 वर्ग कि.मी. में था। 2010 में इसकी वृद्धि की गई, किंतु 2014 में इसके क्षेत्रफल में गिरावट आई है। इससे स्पष्ट है कि आरक्षित वन के समान कोई कठोर नियम नहीं है, जिससे लकड़ी काटने एवं पशुचारण की स्वतंत्रता बढ़ गई है। वनों की क्षति हो इस हेतु पर्याप्त देख-रेख की आवश्यकता है।

 

अवर्गीकृत वन मूलतः स्वतंत्र वन होते है, लेकिन जिला प्रशासन इसके उपयोग पर शुल्क भी लेती है, और ठेके पर भी दिये जाते हैं। 2010 की अपेक्षा 2014 में इस वन में भी गिरावट आई हैं।

 

प्रबंध की दृष्टि से जिलें को 2 वन मंडल में राजनांदगांव तथा खैरागढ़ में विभाजित किया गया है। इन वनमंडलों में सागौन, साल, बांस, कर्रा, महुआ, कौहा, धौरा आदि वृक्ष पाये जाते है।

 

जनसंख्या, उद्योग एवं कृषि विस्तार के फलस्वरूप आधुनिक युग में वनक्षेत्र में आई कमी से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है। औद्योगिकीकरण से वायु, भूमि एवं जल दूषित होते जा रहे हैं और मानव सभ्यता का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। वन संसाधन महज प्राकृतिक सम्पदा ही नहीं है, अपितु मानव एवं वातावरण के मध्य संबंध बनाने में आवश्यक है। राजनांदगांव जिलें में कई तहसीलों में वन का क्षेत्रफल 20 से भी नीचे हो गया है, जबकि वैज्ञानिकों का यह मानना है कि पर्यावरण संतुलन के लिए 33 वन होना चाहिए। यद्यपि जिलें का औसत 34 है, पर जिलें के वन संसाधन को सुरक्षित रखते हुए इस क्षेत्र में और वृद्धि करना आवश्यक है।

 

 

 

 

 

सुझाव:-

01. अवैध कटाई पर नियंत्रण।

02. वनों पर अनियंत्रित चराई पर नियंत्रण।

03. ग्रामीण महिला/पुरूष मिलकर ग्राम वन समिति/वन सुरक्षा समिति बनाएं तथा संयुक्त वन प्रबंधन के माध्यम से वनों की अग्नि, अवैध कटाई, अनियंत्रित चराई तथा अतिक्रमण से रक्षा करें।

04. वन संसाधन का उचित दोहन करें, जिससे आने वाली पीढ़ियों को इसका लाभ मिल सके।

05. तालाबों, सड़कों निजी भूमि पर वृक्षारोपण हेतु जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए।

06. ग्रामीणों को वन संरक्षण पुर्ननवीनीकरण और विकास में उनकी भूमिका के बारे में जागरूक करने की आवश्यकता है।

07. वन समिति द्वारा वन महोत्सव का प्रचार-प्रसार उचित पोस्टरों, गीतों प्रदर्शनियों के साथ ग्रामीण नौजवानों को प्रोत्साहित करना चाहिए।      

   

छत्तीसगढ़ राज्य शासन द्वारा चलाई जा रही योजनाएं - बिगड़ें वनों का सुधार, ग्राम विकास कार्यक्रम, वन विकास कार्यक्रम, उच्च तकनीक रोपण, उत्कृष्ट वनीकरण जिला स्तरीय पुरस्कार योजना, इंदिरा सहेली हरेली योजनाओं के क्रियान्वयन से वन संसाधन में वृद्धि हेतु कार्य किये जा रहे हैं, फिर भी यह संतोषजनक स्थिति नहीं मानी जा सकती। संतुलित पर्यावरण हेतु वन संसाधन में वृद्धि आवश्यक है।

       

संदर्भ ग्रंथः-

1   निस्तार पत्रिका वर्ष 2017, राजनांदगांव वन मंडल, राजनांदगांव (..)

2   जिला सांख्यिकी पुस्तिका, राजनांदगांव (..) ख्1991 2010 2014,

3   पारिस्थितिकीय विकास एवं पर्यावरण भूगोल - पी.एस.नेगी, रस्तोगी पब्लिकेशन, मेरठ

4   संसाधन एवं पर्यावरण भूगोल - गौतम एण्ड षिवानन्द, रामप्रसाद एण्ड संस, आगरा 2008

5   संसाधन एवं पर्यावरण - डाॅ. अलका गौतम -षारदा पुस्तक भवन, इलाहाबाद

6   एजुकेषनल वेव - नेषनल रिसर्च जर्नल, अक्टूबर - दिसम्बर 2011

7   पर्यावरण भूगोल - हरीष कुमार खत्री, कैलाष पुस्तक सदन, भोपाल

8   पर्यावरण भूगोल - अरूण रघुवंषी एण्ड चंद्रलेखा - .प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल

 

 

Received on 05.08.2018                Modified on 03.09.2018

Accepted on 08.10.2018            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(4): 535-538.